बुधवार, 30 सितंबर 2015

एक बुजुर्ग नाई था। एक बार एक माली उसके पास बाल बनवाने के लिये गया। बाल बनवाने के बाद जब उसने पैसे देने चाहे तो नाई ने जवाब दिया- माफ कीजिये मैं आपसे पैसे नहीं ले सकता। मैं समाज सेवा कर रहा हूँ। माली खुश होकर दुकान से चला गया। अगले दिन जब बुजुर्ग नाई अपनी दुकान पर पहुँचा तो दरवाजे पर उसने पाया- एक दर्जन खुशबूदार लाल गुलाब और साथ में एक 'धन्यवाद' कार्ड। दूसरे दिन एक हलवाई उसके पास कटिंग कराने पहुँचा। उसने भी जब कटिंग के बाद जब पैसे देने चाहे तो नाई ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। हलवाई भी खुश होकर वहाँ से चला गया। अगले दिन जब नाई दुकान पर पहुँचा तो दरवाजे पर उसने पाया- एक दर्जन गुलाब जामुन और साथ में एक 'धन्यवाद' का कार्ड। इसी प्रकार एक दिन एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने कटिंग करवाई, पैसे देने पर नाई ने पैसे लेने से इनकार कर दिया, यह कह कर कि वह समाज सेवा कर रहा है। अगले दिन जब नाई दुकान पर पहुँचा तो जानते है, उसने दरवाजे पर क्या पाया ? ... एक दर्जन सॉफ्टवेयर इंजीनियर कटिंग का इंतजार करते हुए और सबके हाथ में फॉरवर्ड किये गए मेल के प्रिंट आऊट।

शनिवार, 26 सितंबर 2015


Rajasthani

मानसरोवर सूं उड़ हंसौ, मरुथळ मांही आयौ धोरां री धरती नै पंछी, देख-देख चकरायौ धूळ उड़ै अर लूंवा बाजै, आ धरती अणजाणी वन-विरछां री बात न पूछौ, ना पिवण नै पाणी दूर नीम री डाळी माथै, मोर निजर में आयौ, हंसौ उड़कर गयौ मोर नै, मन रौ भेद बतायौ अरे बावळा, अठै पड़्यौ क्यूं, बिरथा जलम गमावै मानसरोवर चाल�र भाया, क्यूं ना सुख सरसावै मोती-वरणौ निरमळ पाणी, अर विरछां री छाया रोम-रोम नै तिरपत करसी, वनदेवी री माया साची थारी बात सुरंगी, सुण सरसावै काया जलम-भोम सगळा नै सुगणी, प्यारी लागै भाया मरुधर रौ रस ना जाणै थूं, मानसरोवर वासी ऊंडै पाणी रौ गुण न्यारौ, भोळा वचन-विलासी दूजी डाळी बैठ्यौ विखधर, निजर हंस रै आयौ सांप-सांप करतौ उड़ चाल्यौ, अंबर में घबरायौ मोर उतावळ करी सांप पर, करड़ी चूंच चलाई विखधर री सगळी काया नै, टुकड़ा कर गटकाई अब हंस नै ठाह पड़ी आ, मोरां सूं मतवाळी मानसरोवर सूं हद ऊंची, धरती धोरां वाळी

घाघ और बदरी की कहावतें

सुकाल सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर। परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।। यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे। शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय। तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।। यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा। भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय। ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।। यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है। अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि। चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।। यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे। सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय। घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।। यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा। सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय। महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।। यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे। पूस मास दसमी अंधियारी। बदली घोर होय अधिकारी। सावन बदि दसमी के दिवसे। भरे मेघ चारो दिसि बरसे।। यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी। कहीं कहीं इसे यों भी कहते हैं-‘काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो। पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज। मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।। यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा। अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत। तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।। यदि वैशाख में अक्षम तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा। अकाल और सुकाल सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात। बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।। यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा। असुनी नलिया अन्त विनासै। गली रेवती जल को नासै।। भरनी नासै तृनौ सहूतो। कृतिका बरसै अन्त बहूतो।। यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेतवी नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी। आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत। नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।। आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत सुखद बीतेगा। वर्षा रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय। कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।। यदि रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपै और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे। उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि। भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।। उत्तर नक्षत्र ने जवाब दे दिया और हस्त भी मुंह मोड़कर चला गया। चित्रा नक्षत्र ही अच्छा है कि प्रजा को बसा लेता है। अर्थात् उत्तरा और हस्त में यदि पानी न बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज अच्छी होती है। खनिके काटै घनै मोरावै। तव बरदा के दाम सुलावै।। ऊंख की जड़ से खोदकर काटने और खूब निचोड़कर पेरने से ही लाभ होता है। तभी बैलों का दाम भी वसूल होता है। हस्त बरस चित्रा मंडराय। घर बैठे किसान सुख पाए।। हस्त में पानी बरसने और चित्रा में बादल मंडराने से (क्योंकि चित्रा की धूप बड़ी विषाक्त होती है) किसान घर बैठे सुख पाते हैं। हथिया पोछि ढोलावै। घर बैठे गेहूं पावै।। यदि इस नक्षत्र में थोड़ा पानी भी गिर जाता है तो गेहूं की पैदावार अच्छी होती है। जब बरखा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय।। चित्रा नक्षत्र की वर्षा प्राय: सारी खेती नष्ट कर देती है। जो बरसे पुनर्वसु स्वाती। चरखा चलै न बोलै तांती। पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र की वर्षा से किसान सुखी रहते है कि उन्हें और तांत चलाकर जीवन निर्वाह करने की जरूरत नहीं पड़ती। जो कहुं मग्घा बरसै जल। सब नाजों में होगा फल।। मघा में पानी बरसने से सब अनाज अच्छी तरह फलते हैं। जब बरसेगा उत्तरा। नाज न खावै कुत्तरा।। यदि उत्तरा नक्षत्र बरसेगा तो अन्न इतना अधिक होगा कि उसे कुते भी नहीं खाएंगे। दसै असाढ़ी कृष्ण की, मंगल रोहिनी होय। सस्ता धान बिकाइ हैं, हाथ न छुइहै कोय।। यदि असाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी को मंगलवार और रोहिणी पड़े तो धान इतना सस्ता बिकेगा कि कोई हाथ से भी न छुएगा। असाढ़ मास आठें अंधियारी। जो निकले बादर जल धारी।। चन्दा निकले बादर फोड़। साढ़े तीन मास वर्षा का जोग।। यदि असाढ़ बदी अष्टमी को अन्धकार छाया हुआ हो और चन्द्रमा बादलों को फोड़कर निकले तो बड़ी आनन्ददायिनी वर्षा होगी और पृथ्वी पर आनन्द की बाढ़-सी आ जाएगी। असाढ़ मास पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द्र। तो भड्डरी जोसी कहैं, होवे परम अनन्द।। यदि आसाढ़ी पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों से ढंका रहे तो भड्डरी ज्योतिषी कहते हैं कि उस वर्ष आनन्द ही आनन्द रहेगा। पैदावार रोहिनी जो बरसै नहीं, बरसे जेठा मूर। एक बूंद स्वाती पड़ै, लागै तीनिउ नूर।। यदि रोहिनी में वर्षा न हो पर ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र बरस जाए तथा स्वाती नक्षत्र में भी कुछ बूंदे पड़ जाएं तो तीनों अन्न (जौ, गेहूं, और चना) अच्छा होगा। जोत गहिर न जोतै बोवै धान। सो घर कोठिला भरै किसान।। गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है। गेहूं भवा काहें। असाढ़ के दुइ बाहें।। गेहूं भवा काहें। सोलह बाहें नौ गाहें।। गेहूं भवा काहें। सोलह दायं बाहें।। गेहूं भवा काहें। कातिक के चौबाहें।। गेहूं पैदावार अच्छी कैसे होती है ? आषाढ़ महीने में दो बांह जोतने से; कुल सोलह बांह करने से और नौ बार हेंगाने से; कातिक में बोवाई करने से पहले चार बार जोतने से। गेहूं बाहें। धान बिदाहें।। गेहूं की पैदावार अधिक बार जोतने से और धान की पैदावार विदाहने (धान होने के चार दिन बाद जोतवा देने) से अच्छी होती है। गेहूं मटर सरसी। औ जौ कुरसी।। गेहूं और मटर बोआई सरस खेत में तथा जौ की बोआई कुरसौ में करने से पैदावार अच्छी होती है। गेहूं बाहा, धान गाहा। ऊख गोड़ाई से है आहा।। जौ-गेहूं कई बांह करने से धान बिदाहने से और ऊख कई बार गोड़ने से इनकी पैदावार अच्छी होती है। गेहूं बाहें, चना दलाये। धान गाहें, मक्का निराये। ऊख कसाये। खूब बांह करने से गेहूं, खोंटने से चना, बार-बार पानी मिलने से धान, निराने से मक्का और पानी में छोड़कर बाद में बोने से उसकी फसल अच्छी होती है। पुरुवा रोपे पूर किसान। आधा खखड़ी आधा धान।। पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा पैया (छूछ) पैदा होता है। पुरुवा में जिनि रोपो भैया। एक धान में सोलह पैया।। पूर्वा नक्षत्र में धान न रोपो नहीं तो धान के एक पेड़ में सोलह पैया पैदा होगा। बोवाई कन्या धान मीनै जौ। जहां चाहै तहंवै लौ।। कन्या की संक्रान्ति होने पर धान (कुमारी) और मीन की संक्रान्ति होने पर जौ की फसल काटनी चाहिए। कुलिहर भदई बोओ यार। तब चिउरा की होय बहार।। कुलिहर (पूस-माघ में जोते हुए) खेत में भादों में पकने वाला धान बोने से चिउड़े का आनन्द आता है-अर्थात् वह धान उपजता है। आंक से कोदो, नीम जवा। गाड़र गेहूं बेर चना।। यदि मदार खूब फूलता है तो कोदो की फसल अच्छी है। नीम के पेड़ में अधिक फूल-फल लगते है तो जौ की फसल, यदि गाड़र (एक घास जिसे खस भी कहते हैं) की वृद्धि होती है तो गेहूं बेर और चने की फसल अच्छी होती है। आद्रा में जौ बोवै साठी। दु:खै मारि निकारै लाठी।। जो किसान आद्रा में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है। आद्रा बरसे पुनर्वसुजाय, दीन अन्न कोऊ न खाय।। यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा हो और पुनर्वसु नक्षत्र में पानी न बरसे तो ऐसी फसल होगी कि कोई दिया हुआ अन्न भी नहीं खाएगा। आस-पास रबी बीच में खरीफ। नोन-मिर्च डाल के, खा गया हरीफ।। खरीफ की फसल के बीच में रबी की फसल अच्छी नहीं होती।

माता पिता

संसार है सागर अगर तो माता पिता भी नाव है जिसने की माता पिता की सेवा बेडा उसका पार हैं। । जिसने दुखाइ माता पिता की आत्मा वह नर डूबता माँझ धार है।।

Ramdevji baba runusha

बाबा रामदेवजी बाबा रामदेव अेक लोकदेवता रै रूप में पुजीजै। लोक देवता अै अैड़ा, जिका कृष्ण रा अवतार मानीजै। राजस्थान रै अलावा गुजरात मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेशंजाब, इत्याद प्रदेशां मरांय ई इणां री मान्यता है। भादवै अर माघ महीणां रै चानणै पख री दसमी नै इणां रै समाधि-स्थल रामदेवरा मांय भरीजण वालै मेलां मांय न्यारै-न्यारै प्रदेशां रै जातरूवां री घणी भीड़ रैवै। बाबा रामदेव रै उपासकां में राजा-महाराजावां अर सेठ-साहूकारां सूं लेय'र साधारण सूं साधारण लोग ई सामल हुवै। हरेक गाम-नगर, बास-मुहल्ला मांय बाबा रामदेव रा उपासना-स्थल बणियोड़़ा है। इणरै अलावा लोग आप-आपरै घरां मरांय ई उणां रा 'पगलिया' थापन कर' र सुतंतर रूप सूं उपासना करै। बाबै रा भगत लोग आपरै गलां मांय चांदी या सोनै रा 'फूल' धारण करियोड़ा रैवै जिका सैज ई पिछाणिया जायै। उत्तरादै भारत मांय बाबा रामदेव ई अेकमात्र अैड़ा देवता है जिणां रै पूजा-स्थल में हिंदू-मुसलमान, सवर्ण, असवर्ण, अमीर-गरीब इत्याद रौ कोई भेद नीं है। सगलाई समान रूप सूं उणां री पूजा-अरचणा कर सकै अर अेक इज कुंडी सूं चरणाम्रत पान करै। जिण तरै हिंदू इणां नै 'बाबा रामदेव' कैय' र पुकारै, उणी तरै मुसलमाना इणां नै 'रामशाह पीर' नाम सूं संबोधित करै। पैला सूं इज प्रचलित सिद्ध संप्रदाय अर भगत कबीर रै बीच बाबा रामदेव इज अेक अैड़ा महापुरुष हुया है, जिका जात-पांत रौ भेद मिटाय'र मिनख मात्र नै समान मानण सारू जतन करिया अर वै उणमें सफल ई हुया। बाबा रामदेव रा बडेरा तुंवर अनंगपालजी दिल्ली रा छेहला तुंवर सम्राट हा। सांभर रा चौहाण उणां सूं दिल्ली रौ राज खोस लियौ हौ। सो राजा नीं रैया तुंवर अनंगपाल आपरै परिवार रै साथै दिल्ली छोड'र मौजूदा जयपुर जिलै रै त्हैत आयै 'नराणा' नाम रै गाम मांय रैवास करियौ हौ। जयपुर जलै रौ औ छेत्र आज ई पण 'तुंवर वाटी' रै नाम सूं ब तलाईजै। इणी परिवार मांय तुंवर रणसी हुया। अै आपरै बगत रै चावै संत रै रूप में ओलखीजता हा। इणां रै चमत्कारा सूं प्रबावित हुय'र अनेक लोग उणां रा अनुयायी बणग्या। कैयौ जावै के आ घटना उण बगत रै काजियां नै घणी पुरी लागी। वै इणां री शिकायत बादसा सूं करी। बादसा तुंवर रणसी नै दिल्ली बुलाया अर चमत्कार दिखावण रौ कैयौ। तुंवर रणसी अनेकूं चमत्कार बताया, जिणां सूं बादसा डरग्यौ अर आपरै आदमियां सूं इणां रौ सिर कटवाय दियौ। इण घटना रै बाद इणां रा पुत्र तुंवर अजैसी आपरै परिवार रै साथै 'नराणा' गाम छोड'र पिच्छम कानी चाल पड़िया। केई दिनां रै बाद वै मौजूदा बाड़मेर जिलै री शिव तैसील रै त्हैत आयै गाम ऊंडू-काश्मीर पूगिया। इण गाम सूं पिच्छम कानी कोई च्यार किलोमीटर री दूरी माथै अेक ब ौत बड़ौ थल है। उणनै सुरक्षा री दीठ सूं उचित समझता थकां अजैसी इणी थल रै बीच गाडियां छोडी। वरतमान में औ स्थान 'गडोथल' नाम सूं इज पुकारीजै। वांई दिनां कुंडल गाम रौ शासक बुध भाटी-पम्मौ घोरंघार शासन गमाय'र अठी-उठी लूट-खसोट कर रैयौ हो। उणरा आदमी जद इण तुंवर काफिलै नै नवौ आयोड़ौ देखियौ तौ वौ लूटण री योजना बणाई। पण जद खुद पम्मै धोरंधार रौ सामनौ तुंवर अजैसी सूं हूयौ, तौ उणरौ विचार बदलग्यौ अर वौ आपरी पुत्री 'मैणादे' या 'मेणादे' री सगाई तुंवर अजैसी रै साथै कर दी। बाबा रामदेव आं ई मैणादे री दूजोड़ी सन्तान रै रूप मांय अवतरिया। तुंवर अजैसी या अजमल नै पुत्र-लाभ घणौ बगत बीतियां हुयौ हौ। बडै पुत्र वीरमदेव रौ जनम सं. 1405 वि. नै हुयौ और छोटै पुत्र रामदेव रौ जनम वि. सं. 1409 मै चैत सुद पांचम सोवार रै दिन हुयो। रामदेव रै जनम रै बगत आखै देश री हालत कोई अच्छी नीं ही। केन्द्र मांय मुसलमानां रौ घणियाप हौ। ूजै प्रदेसां मांय छोटा-छोटा राज्य हा, जिका जरा-सीक बात सारू ई भड़क' र जुद्ध नै त्यार हुय जावता हा। राजगादी सूं हटियोड़ा-हटायोड़ा शासक लुटेरां रै रूप मांय जनता नै पीडित करता रैवता हा। धारमिक स्थिति ई अैड़ी ई ही। भांत-भांत रै अनेक पंथां सम्प्रदायां रौ बोलबालौ हौ। कीं रहसवादी मतां वाला लोगां नै घोखौ देय'र आपरै स्वारथ री सिद्धी करण में लाग्या रैवता हा। कींअेक भैरव बण'र जनता नै अणूंतौ इज दुख कष्ट दिया करता हा। वरतमान पोकरण मांय वां दिनां 'बालिनाथ' कै 'बालकनाथ' नाम रै अेक नाथ-योगी रौ आसण हौ। रामदेव इणां नै इज आपरा सतगुरु बणाया। धारमिक दीठ सूं नाथपंथ दूजै पंथां री बजाय बेसी उदार अर सन्मारग माथै चालण बालौ पंथ मान्यौ जावतौ हौ। आखै देश मांय इण पंथ री मान्यता ही। गुरु रै उपदेश मुजब रामदेव अछूतोद्धार में लागिया अर कोढी, खज, आंधा, पांगला रोगियां री सेवा करण रौ भार आपरै कंधा माथै उठायौ। तत्कालीन समाज मांय अछूतां री हालत ई बड़ी दयनीय ही। उणां नै आपरै आसरौ देवणियां री किरपा माथै निरभर रैवणौ पड़तौ हौ। रामदेव पैल परथम अेक मेघवाल जात री लड़की 'डालीबाई' नै तत्कालीन सिद्ध परम्परावां मुजब 'महामुद्रा' रै पूर में स्वीकार कर'र आपरी सहयोगिणी बणायौ। छुआछूत नै नीं मानियां वां नै आपरै सगै-संबंयिां रै कोप रो सिकार बणणौ पड्यौ। पण बाबा रामदेव इणरी परवा नीं करी अर मेघवालां नै लेय'र भजन-कीरतन करण लागिया। किणी कारणां सूं धरम-भिस्ट या समाज बारै करियोड़ै़ लोगां नै समाज मांय पाछौ सनमान दिरवावण सारू रामदेव अेक संत मत री थरपणा ई करी। इण मत मांय बिना भेद-भाव रै कोई ई सगस सामल हुय सकतौ हौ। इण धरम मांय दीक्षित सगस नै हाथ मांय 'कामड़ी' (बैंत) राखणी पड़ती ही, सो औ पंथ 'कामड़िया पंथ' रे नाम सूं चावौ हुयौ। आजकल औ पंथ अेक उपजाति रौ रूप (कामड़िया) धारण कर लियौ है। अै लोग आपरै सिर माथे भगवा रंग रौ फेंटौ-पगड़ी धारण करै अर बाबा रामदेव रौ जुम्मौ-जागरण देवै। इण पंंथ मांय धरम रे प्रचलित दस लक्षणां नै मान्यता मिलण सूं इणनै 'दसा धरम' ई कैयौ जावै। पोकरण सूं पूरब दिस कानी कोई तीनैक किलोमीटर री दूस्री माथै अेक ड़ी माथै भैरव री गुफा आई थकी है। औ भेरव (भैरव रौ उपासक) अणूंतौ ई करूर हौ। आपरै इष्ट नै प्रसन्न करण सारू औ मिनखां री बलि दिया करतौ हौ। नतीजन लोग डर परा'र पोकरण छोड दियौ। बालिनाथ रै अलावा दूजौ कोई सगस उण स्थान माथै रैवण री हिम्मत नीं कर सकै हौ। बालिनाथ खुद ई इण भैरव रै उत्पातां सूं दुखी हा। रामदेव नै जद पतौ चालियौ तौ वै इण समस्या सूं निपटण सारू कमर कसी। ऐ आपरै पराक्रम सूं भैरव नै परास्त कर्यौ। परास्त भैरव गिडगिडाय'र रामदेव सूं आपरै प्राणां री भीख मांगी। रामदवे पोकरण रै आखती-पाखती रौ आगोर उणरै विचरण सारू सुरक्षित कर दियौ अर जद तांई जीवतौ रैवै, तद तांई पोकरण रै शासन कानी सूं उणरै भरण-पोखण रौ वचन ई दियौ। इणरै बाद भैरव करूर करमां रौ परित्याक कर'र अेक साधु रौ जीवण बीतावण लागियौ। भैरव रौ आतंक खतम हुयां पुराणा लोग पाछा आय-आय'र बसण लागिया। सो पोकरण रौ उजाड़ इलाकौ भरी-पूरी बस्ती बणग्यौ अर लोग सुख सूं जीवण बितावण लाग्या। इण भांत बाबा रामदेव रै जन-हितकारी कामां अर भैरव जैैड़ै क्रूर करम वालै सगस नै सन्मारग माथै लेय आवण रै परिणामस्वरूप लोगां इणां नै अेक चमत्कारी पुरस (सिद्ध) रै रूप में मान्यता दीवी अर हजारूं लोग इणां रा भगत बणग्या। इत्तौ ई नीं, बाबा रामदेव रा उपासक इणां नै भगवान विष्णु रै दसवैं अवतार 'कल्कि' रै रूप मांय ई मानण लागिया। बाबा रामदेव नै 'निकलंक देव' रौ विरुद जीवण-काल मांय ई मिलग्यौ हौ। भाटी उगमसी, मेघवाल धारू, राठौ़ड शासक मल्लिनाथ अर उणां री जोड़ायत रूपांदे, जैसल ्‌र उणरी जोड़ायता तोलांदे, डाली बाई इत्याद उणां रै खास उपासकां मांय हा। सुचावा सांखला हड़बू बाबा रामदेव रै कैयां अस्तर-सस्तर त्याग'र अेक साधु रौ सो जीवण बितावण लागिया हा। अै ई बालिनाथ सूं दीक्षा लीवी ही। बाबा रामदेव रा अेक काका 'धनरिख' (धनरूप) नामर रा हा। जद अजमल री तुंवरावाटी रौ गाम नरेणा छोड़'र मारवाड कानी आयग्या हा, तद धनरिख जी उठै इज रैयग्या हा। अै ई अेक चमत्कारी महापुरुष रै रूप में चावा हा। अै आपरै बुढा़पै मांय बाबा रामदेव नै आपरै कनै बुलाय लिया हा। उठै गयां रै बाद बाबा रामदेव री प्रसिद्ध दिन दूणी रात चौगुणी फैलण लागी। चित्तौड़ रै महाराणा कुंभा माथेै जद गुजरातियां हमलौ करियौ, तद उपासकां जिणां रै गला मांय बाबा रामदेव रा फूल हा, महाराणा कुंभा रौ साथ दियौ। नतीजन गुजराती भागग्या। इण प्रसंग नै याद राखण सारू जीतियां रै बाद महाराणा कुंभा 'निकलंक देव मिंदर' रौ निरमाण करायौ हौ, जिण मांय घुड़सवार सगस (बाबा रामदेव) री मूरती थापना करी ही। औ मिंदर आज ई मौजूद है। पौराणिक कथानक मुजब सूरज (महाराणा कुंभा) नै जद कलिंग राक्षस (गुजराती) आपरै प्रभाव सूं आवृत्त कर लैवैला, त भगवान कल्कि (निकलंक) रूप धारण कर'र उणरौ उद्धारकरैला। ऊपरदिरीजी महाराणा कुंभा री घटना रौपाणिक कथानक सूं मेल खावै। सो बाबा रामदेव री पूरबी छेत्रां मांय ई प्रसिद्धि हुयगी अर वै निकलंक देव रै साथै-साथै 'पिछमाधिपति', 'पिछमाधीस', 'पिछम धरा रा पातसाह', 'पिछमी धणी' इत्याद विरूदां नै धारण करण लागिया। काकै धनरिख रै समाधि लियां रै बाद बाबा रामदेव पाछा आपरै इलाकै मांय आयग्या। पोकरण आयां रै बाद उमरकोट रै सोढ़ा दलैसिंघजी रू पुत्री नेतलदे रै साथै इणां रौ ब्याव हुयग्यौ। नेतलदे री कोख सूं इणां नै देवराज नाम रे पुत्र री प्राप्ति हुई। खेड़ रा राठौ़ड शासक रावल मल्लिनाथ नै बाबा रामदेव आपरा मूंडाबोला भाई मानता हा। पोकरण रौ इलाकौ मल्लिनाथ सूंआपरै रैवास सारू मांग लियौ हौ। तुंवर परिवार अठै आराम सूं रैय रैयौ हौ। पण बाबा रामदेव री गैरहाजरी में इणां रा बड़ा भाई वीरमदेव आपरी पुत्री रौ संबंध मल्लिनाथ रै पोतै (जगमाल रै बैटै) हम्मीर रै साथै कर दियौ। इणसूं चिड़'र बाबा रामदेव पोकरण छोड़'र रामदेवरा' रीनींव राखी। औ स्थान पोकरण सूं पूरबोत्तर मांय कोई 4 किलोमीटर री दूरी माथै है। पाणी री कमी मिटावण सारू अै गाम सूं पिच्छम कानी अेक तलाव रौ निरमाम करायौ, जिकौ आजकल 'राम सरोवर' रै नाम सूं जाणीजै। इणी तालाब री पाज माथै फगत तेतीस बरस री उमर में ई कीरत रा कमठाण बण'र रामसापीर वि. सं. 1442 री भादवा सुदी ग्यारस रै दिन जीवित समाधि लीवी ही। ख्यातां मांय उल्लेख मिलै के इणी स्थान माथै बाबा रामदेव रै समाधि लियां रै आठ दिन बाद सांखला हड़बू ई समाधि लीवी ही। ख्यातां मांय उल्लेख है के पैला राव जोधा रौ विचार मसूरिया नाम रै परबत माथै किलौ बणावण रौ हौ, पण अठै आखती-पाखती पाणी री कमी हुवण सूं औ विचार छोडणौ पड़ियौ। उणी बगत उण परबत माथै रैवण वालौ अेक साधु इणां नेै पचेटिया नाम रै परबत माथै किलौ बणावण री सलाह दीवी। आ बात राव जोधा नै दाय आयगी। कैवै के इणरी अेवज में वौ साधु राव जोधा सूं दो प्रार्थनावां करी। अेक तौ आ के रामदेवजी रै दरसण सारू रूणेचा जावण वाला जिका जातरू अठीनै सूं निकलै, पैला उणरै आसरम मसूरिया आवै अर दूजी आ के राज री कानी सूं साल में दो बार उणरै आसरम मसूरिया आवे अर दूजी आ के राज री कानी सूं साल में दो बार उणरै आसरम मांय भेंट भेजी जावै। राव जोधा उणां री दोनूं प्रार्थनावां स्वीकारली। इण उल्लेख सूं सिद्ध हुय जावै के राव जोधा रै किलै री नींव राखण (जेठ सुदी 11, शनिवार, वि. सं. 1515) सूंपैला बाबा रामदेव समाधि लेय चुकिया हा अर उणां री याद में जातरू दरसण नै आवण लागया हा। उल्लेखजोग है के मसूरिया परबत माथै बाबा रामदेव रा गुरु बालिनाथजी समाधि लीवी ही। औ साधु बाबा रामदेव रौ ई अनुयायी हुवैला अर आपरै गुरु री सेवा मांय रैवतौ हुवैला। भाटी हरजी बाबा रामदेव रा अनन्य भगत अर गायक हुया। भाटी हरजी री रच्योड़ी वांणियां रै संबंध में औ दूहौ लोक मांय चावौ है- हरजी गरजी नाम रा, पासे किया पंपाल। लाख सबद लेखै चढ्या, ग्रंथां भर्या भंडार।। रामदेवजी आपरै उपदेसां अर वैवार सूंं हिंदूवां अर मुसलमानां रै विचालै साम्प्रदायिक अेकता रा घणा लूंठा जतन किया। उणरौ दोनूंसंप्रदायां माथै असर पड़ियौ। वां में अेकता रौ वातावरण बण्यौ अर मुसलमन ई रामदेवजी नै 'पीर' मान'र पूजण लाग्या। आज दिन तांई दोन्यूं धर्मावलम्बी वां नै घणी सरा सूं पूजै। 'बाबौ रामदेव' अर 'रामसापीर' अै दोनूं नाम हिंदू मुस्लिम अेकता रा प्रतीक है। अल्ला आदम अलख तूं, राम रहीम करीम। गोसांई गोरक्ख तूं, नाम तेरा तसलीम।। बाबा रामदेव बाबत औ दूहौ अेक भगत कवि खैमौ वि. सं. 1729 मैं कैयौ। वां जगत में लोकदेवता, देवपीर अर परमेसर रै रूप में प्रतिष्ठा पाई। घर ऊजल घवली धजा, निरमल ऊजल नीर। राजा ऊजल रामदे, परचा ऊजल पीर।। राम कहूं क रामदे, हीरा कहूं क लाल। ज्यांनै मिलिया रामदे, वां नै किया निहाल।।

वीर तेजाजी

वीर तेजाजी बिरखा रूत सरू हुवतां ई राजस्थान रै गामां रौ वातावरण 'तैजे' री टेर सूं गूंजण लागै। हरेक करसौ आपरै खेत मांय 'तेजा टेर' रै साथै ई बुवाई सरू करै। जाट जाति में पेैदा हुया तेजाजी गोगाजी री दाई सांपां रै देवता रै रूप में राजस्थान में पूज्या जावै। इण रूप में वां रै पूजीजणा रै लारै अेक घटना रैयी है वां रै ई जीवण री। राजस्थान रै लोक-देवतावां में तेजाजी री ई ठावी ठौड़ है। इणां री जनम-तिथि रै संबंध में कोई समसामयिक साक्ष्य उपलब्ध नीं है, पण इणां रै वंश रै भाटां री बहियां देखण सूं पतौ चालै के इणां रौ जनम मारवाड़ रै नागौर परगनै रे खड़नाल नाम रै गाम में जाट जाति रै धोल्या गौत्र में वि. सं. 1130 री माघ सुदी 14 नै बिस्पतवार (1074) रे दिन हुयौ हौ। इणां रेै पिता रौ नाम ताहडजी अर माता रौ नाम रामकुंवरी हौ। कैयौ जावै के पेमल इणां री छेहली पत्नी ही अर इणसूं पैली इणां रा पांच व्याव हुय चुक्या हा। गोगाजी री दाई तेजाजी ई आपरौ जीवण गायां री रक्षा में लगाया दियौ हौ। लोकगीतां सू पतौ चालै के जद अै आपरी पत्नी पेमल नै लेवण सारू पनेर गयोड़ा हा, उणी बगत मेर लोग लाछा गूजरी री गायां चोरनै लेयग्या। गूजरां री प्रार्थना माथै तेजाजी मेरां रौ लारौ कर्यौ अर कठण संघर्षां रे बाद गायां नै छुडावण में सफलता प्राप्त करी। पण इण संघर्ष में अै अणूंता ई घायल हुयग्या, जिणसूं अै जमीन माथै हेठा पड़ग्या अर इणरै बाद सरप रै काटण री वजै सूं इणां रौ देहांत हुयग्यौ। इणां रौ देहांत किशनगढ रै त्हैत आयै सुरसरा गाम में हुयौ हौ। इणां रे लारै इणां री पत्नी सती हुई। तेजाजी रै बारै में भाट भैरू (डेगाणा) री बही मुजब तेजाजी रौ देहांत वि. सं. 1160 री माघ बदी 4 नै हुयौ हौ जद के जनसाधारण में इणां रौ ेहांत दिन भादवा सुदी 1 प्रचलित है। तेजाजी नै सरप रै काटण रे बाबत केई लोकगाथावां मिलै। अेक गाथा मुजब जद तेजाजी आपरै सासरै जाय रैया हा, तौ रस्तै मेें आं अेक सरप नै बलण सूं बचाय लियौ, पण इणां री इण कोसिस रै दरम्यान उणरी सरपणी बल चुकी ही। सो बचियोड़ौ सरप क्रोध में पागल हुयग्यौ अर तेजाजी नै डसण लाग्यौ। तद तेजाजी उणनै रोकता थकां वचन दियौ के - "सासरै जाय'र म्हैं पाछौ थारै कनै आवूं, तद थूं म्हनै डस लीजै।" सासरै गयां इणां नै अचाणचक गायां छुडावण सारू मेरां रै लारै जावणौ पड्यौ। मेरां रै साथे हुयै संघर्ष में अै अणूंता ई घायल हुयग्या हा, तौ ई आपरै वचन निभावण सारू अै उण सरप कनै पूग्या। तद इणांने देख'र सरप कैयौ के - " थांरौ तो सगलौ सरीर ई घावां सूं भर्यौ पड्यौ है, म्हैं डसूं ई तौ कठै डसूं?" इण बात माथै तेजाजी आपरी जीभ निकाली अर सरप इणां री जीभ नै डस लियौ। दूजै कानी लोकगाथा मुजब तेजाजी जद गायां चरावण नै जाया करता हा, तद अेक गाय अलग हुय'र अेक बिल रै कनै जावती परी ही, जठै अेक सरप निकल'र गाय रौ दूध पीय जावतौ हौ। आ बात ठा पड़ियां तेजाजी सरप नै नित दूध पावण रौ वादौ कर्यौ। पण, किणी वजै सूं अेक दिन अै उणने दूध पावणौ भूलग्या। इण बात माथै सरप रीस में झालौझाल हुय'र इणां नै डसणौ चायौ। तद तेजाजी सासरै जाय'र उठै सूं बावड़ियां खुदौखुद नै डसावण रौ वायदौ कर्यौ। जद तेजाजी सासरै सूं घायल हुयोड़ा आय'र उण जगै पूग्या, तौ सरप तेजाजी रौ सारौ सरीर घायल देख'र जीभ माथै डस लियौ। तीसरी लोकघाथा मुजबमेरां रै साथै हुयै संघर्ष में वै अणूंता ई घायल हुयग्या हा, सो वै उठै ई हेठा पड़ग्या। उण बगत उठै सरप बैठ्यौ हौ जिकौ अजेज तेजाजी री जीभ माथै काट खायौ। तेजाजी रे कर्यौडै शौर्यपूर्ण कृत्य, त्याग, वचन-पालणा अर गौ-रक्षा ई इणां नै देवत्व प्रदान कर्यौ। सरू में इणांरे मिरतु-स्थल सुरसरा में इणां रौ अेक मिंदर बणवाईज्यौ, जठै अेक पशु मैलौ लाग्या करतौ हौ। पण वि. सं. 1791 परवाणै सन् 1734 ई. में जोधपुर-महाराजा अभयसिंह रै बगत परबतसर रौ हाकिम उठै सूं तेजाजी री मूरती परबतसर लेय आयौ। तद सूं परबतसर तेजाजी रौ खास स्थान बणग्यौ है। परबतसर में भादवा सुदी 5 सूं 15 तांई अेक विसाल पशु-मैलौ लागै, जिणमें बौत ई बडी संख्या में दूर-दूर रै स्थानां रा सैकडूं वौपारी अर दरसणारथी अेकठ हुवै। तेजाजी रा दूजा खास-खास मेला इणां री जनमभूमि खड़नाल, सुरसरा अर ब्यावर में लागै, जठै इणां रा मिंदर बणियोड़ा है। किशनगढ़, बूंदी, अजमेर इत्याद भूतपूर्व रियासतां में ई केई स्थानां माथै तेजाजी रा मिंदर है। वियां राजस्थान रै अमूमन हर गाम में इणां रा देवरा बणियोड़ा है, जिणां सूं इणां री लोकप्रियता आंकी जाय सकै। आं देवरां रै त्हैत तेजाजी री मूरती गाम रै अेकाध चबूतरै माथै प्रतिष्ठित करीजै, जिकी हाथ में तलवार लियोड़ा घोडै़ माथै असवार रै रूप में हुवै जिणां री जीभ नै सांप डसतौ थकौ दिखायोड़ौ हुवै, कनै ई इणां री पत्नी ई ऊभी हुवै। राजस्थान में भादवा सुदी 10 नै तेजाजी रौ पूजन हुवै। इण दिन धणकारा लोग तेजाजी रौ ब्यावलौ बंचवावै तौ केई इणां री कथा-वाचन रौ आयोजन करवावै। कठै-कठै ई इणां री जीवण-लीला री व्याख्या में ख्याल ई खेल्या जावै, जिणनै देखण सारू ब डी भारी संख्या में गाम रा लोग भेला हुवै। जाटां में तेजाजी रा भगत बेसी है। अमूमन जाट गलै मांय चांदी रौ अेक ताबीज पैर्यां राखै, जिण माथै तेजाजी अश्वारोही (घुड़सवार) जोद्धा रै रूप में हाथ में नागी तरवार लियोड़ा अर अेक सरप उणां री जीभ नै डसतौ थकौ अंकित कर्योड़ौ हुवै। राजस्थान में अै ई गोगाजी री दाई सरपां रेै देवता रै रूप में पूज्या जावै। राजस्थान री गांवेड़ी जनता रौ अैड़ौ विसवास है के जे सरप रै डस्योड़ै मिनख रै जीवणै पग में तेजाजी री तांती (डोरी) बांध दी जावै, तौ उणने ज्हैर नीं चढ़ै। बाद में, उण मिनख नै तेाजी रै स्थान माथै ले जायौ जावै अर विधिपूर्वक पूजा रै उपरांयत वा तांती काट दी जावै। मिनखां रै अलावा सरपां रै काट्योडै़ पशुवां रै ई आ तांती बांधीजै। तेजाजी नै लेय'र राजस्थान में अणमाप लोक साहित्य रौ निरमाण हुयौ है। जन साधारण में अर कास करनै करसां में तेजाजी रै साहसिक, दृढप्रतिज्ञ अर सेवाभावी जीवण री गुणावली रै साथै-साथै इणां रै घरू जीवण संबंध घटनावां री गाथा ई हुवै जिकी ठीक करसां रै अनुरूप हुवै। सो असाढ़, सावण अर भादवै रै महीनै में गामां रौ वातावरण तेजाजी रै गीतां सूं गूंजतौ रैवै। हरेक करसौ 'तेजा टेर' रै साथै बुवाई सरू करै, क्यूं कै वौ अैड़ौ करणौ आपरी भावी फसल सारू शुभ समझै। इणरै अलावा उणां रौ जीवण ई तेजाजी रै जीवण रै समान ई है, क्यूं कै ऊणां ने ई वां ई परिस्थितियां सूं सामनौ करणौ पड़ै जिणां सूं तेजाजी ई कर्यौ हौ। सो आं गीतां सूं करसां नै आपरै लौकिक जीवण रे कार्यकलापां मैं बरौबर प्रेरणा मिलती रैवै। लुगायां रै गावण वालै तेजाजी रै गीतां में सूं अेक गीत में तेजाजी सूं कालै नाग रौ ज्हैर उतारण सारू अरज करीजी है। अेक दूजै गीत सूं ठा पड़ै के तेजाजी रै नाम सूं ई ज्हैर शांत हुय जावै। इण भांत आं न्यारै-न्यारै गीतां सूं तेजाजी रै प्रति राजस्थानी लोक हिरदै मांय व्याप्योड़ी श्रद्धा-भावना रौ पतौ पड़ै। तेजाजी रै चमत्कारां री इधकाई रौ वरणाव अनेकूं लोक गीतां मुजब उल्लेखजोग है। इण गीतां में तेजाजी अर नाग रै बतलावण री छिब देखणजोग- डोर तौ लागी छै रै, श्री भगवान सूं, झूठो सब संसार रै, बाबा बासग। झूठी तौ काया रै, साचौ रामजी, सत पै सांी खड़ौ छै रै, बाबा बासग।। तैजाजी रै इण भगती-उद्गारां रौ पडूत्तर देवता थका नागराज कैवै- सत पै ही मरेगौ रै, लड़कौ जाट को, धन-धन थारा सत नै रै, तेजल बेटा। घनयक तौ छै जी रै थारा ग्यान नै, घर-घर में पुजावा दूं रै, तेजल थनैं।। लोक जीवण में अर खास र' कृषक समाज में तेजाजी री अणूंती ई धावना रैयी है खेतां मांय हल चलावतै बगत किरसाण तेजा टेर सूं काम करणौ सरू करै- कलजुग में तौ दोय फूलड़ा बडा जी, अेक सूरज दूजौ चांद औ। वासग रा औ तेजाजी थे बडा जी, सूरज री करिणां तपै जी, चंदा री निरमल रात औ।। इंदर तौ बरसावै जी, धरती तौ निपजावै धान हौ। मायड़ जण जलम दीना, बाप लडाया छै लाड जी।।